सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर अंतिम सुनवाई तेज कर दी है। यह मामला न केवल सबरीमाला बल्कि अन्य धर्मों में प्रचलित परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है।
संवैधानिक अधिकारों पर केंद्रित सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली यह विशेष पीठ मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या कर रही है। अदालत इस बात का विश्लेषण कर रही है कि व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संप्रदायों के अपने मामलों के प्रबंधन के अधिकार की सीमा क्या होनी चाहिए। सुनवाई के दौरान अदालत ने अंधविश्वास और सती प्रथा जैसी पुरानी कुरीतियों का संदर्भ देते हुए धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव पर गंभीर टिप्पणी की है।
केंद्र सरकार का पक्ष और दलीलें
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। सरकार की दलीलों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- सॉलिसिटर जनरल के अनुसार किसी विशेष आयु वर्ग के किसी खास जेंडर को पूजा स्थल में प्रवेश करने से रोकना हमेशा भेदभाव की श्रेणी में नहीं आता।
- धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को केवल आधुनिक समानता के तराजू पर नहीं तौला जा सकता।
- केंद्र का मानना है कि आस्था के विषयों में अदालत का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए, बशर्ते वह मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन न हो।
संभावित प्रभाव और सामाजिक विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई का असर केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं रहेगा। इस फैसले से मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश और पारसी महिलाओं के अधिकारों जैसे अन्य संवेदनशील मुद्दों पर भी दिशा-निर्देश तय होंगे। अदालत यह स्पष्ट करने की कोशिश कर रही है कि क्या ‘धार्मिक स्वायत्तता’ के नाम पर किसी वर्ग को मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जा सकता है।
एक तरफ जहां पारंपरिक मान्यताओं को बचाए रखने का तर्क दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ लैंगिक समानता और संवैधानिक नैतिकता को सर्वोपरि रखने की मांग की जा रही है।
एक झलक
- सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ सबरीमाला मामले पर अंतिम सुनवाई कर रही है।
- मामले में अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर विचार किया जा रहा है।
- अदालत ने सुनवाई के दौरान अंधविश्वास और सती प्रथा जैसे ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख किया।
- केंद्र सरकार ने पूजा स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध को पूरी तरह भेदभाव मानने से इनकार किया है।
- यह फैसला भविष्य में देश के कई अन्य धार्मिक विवादों के लिए नजीर बनेगा।