असम में हिमंता का ‘अजेय’ किला क्या ढह जाएगा? मोदी की उत्तर-पूर्व रणनीति पर बड़ा खतरा!

असम विधानसभा चुनाव के परिणाम केवल एक राज्य की सत्ता तय नहीं करेंगे, बल्कि यह बीजेपी के ‘पूर्वोत्तर चाणक्य’ हिमंता बिस्वा सरमा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का लिटमस टेस्ट भी होगा। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने दावा किया है कि बीजेपी गठबंधन इस बार 90 से 100 सीटें जीतेगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि असम में बीजेपी की हार होती है, तो इसके राष्ट्रीय और क्षेत्रीय परिणाम क्या होंगे?

हिमंता बिस्वा सरमा की ब्रांडिंग और भविष्य हिमंता बिस्वा सरमा ने खुद को केवल एक मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि उत्तर-पूर्व में बीजेपी के सबसे बड़े संकटमोचक के रूप में स्थापित किया है। घुसपैठ, यूसीसी (UCC) और पहचान की राजनीति पर उनके कड़े रुख ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। असम में उनकी हार का मतलब होगा उनके उस ‘अजेय’ छवि का अंत, जिसके दम पर वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाना चाहते हैं। अगर वह अपना गृह राज्य नहीं बचा पाते, तो नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) के मुखिया के तौर पर उनका प्रभाव कम हो जाएगा और केंद्रीय मंत्रिमंडल या संगठन में उनके ऊंचे पदों पर जाने के रास्ते बंद हो सकते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की ‘अष्टलक्ष्मी’ रणनीति पर संकट पीएम मोदी ने पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को भारत के विकास की ‘अष्टलक्ष्मी’ बताया है। 2014 के बाद से केंद्र ने यहाँ इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे बोगीबील ब्रिज और नए हवाई अड्डों पर भारी निवेश किया है। यदि बीजेपी यहां कांग्रेस गठबंधन से हारती है, तो यह संदेश जाएगा कि विकास के दावों पर स्थानीय मुद्दे और पहचान का संकट भारी पड़ गया है। असम पूरे उत्तर-पूर्व का प्रवेश द्वार है; यहाँ हारने का मतलब है अन्य छोटे राज्यों में क्षेत्रीय दलों का मनोबल बढ़ना और बीजेपी की पकड़ कमजोर होना।

हवा का रुख और हिमंता का दावा विपक्ष के हमलों और कयासों के बीच हिमंता पूरी तरह आश्वस्त हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कांग्रेस 18-22 सीटों पर सिमट जाएगी। उनका तर्क है कि इस बार ‘भूमिपुत्रों’ (स्थानीय निवासियों) ने असम की संस्कृति बचाने के लिए रिकॉर्ड मतदान किया है। उन्होंने सिंगर जुबीन गर्ग की दुखद मृत्यु जैसे भावनात्मक मुद्दों को चुनावी राजनीति से अलग रखते हुए अपनी जीत का भरोसा जताया है। अब देखना यह है कि क्या हिमंता का यह आत्मविश्वास उन्हें फिर से सत्ता दिलाता है या असम की राजनीति कोई नया मोड़ लेती है।

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