महिलाओं को महीने में 3 दिन अछूत मानना गलत जस्टिस नागरत्ना की बड़ी टिप्पणी

महिलाओं को महीने में 3 दिन अछूत मानना गलत जस्टिस नागरत्ना की बड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार पर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी महिला को महीने के तीन दिनों के लिए “अछूत” नहीं माना जा सकता और फिर चौथे दिन उस स्थिति को अचानक समाप्त नहीं किया जा सकता।

संवैधानिक पीठ की सुनवाई और मुख्य बिंदु

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को तय करने के लिए 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले की समीक्षा कर रही है। इस पीठ का नेतृत्व प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत कर रहे हैं। सुनवाई के दौरान निम्नलिखित प्रमुख कानूनी पहलुओं पर चर्चा की गई:

  • अनुच्छेद 17 और अस्पृश्यता: 2018 के फैसले में कहा गया था कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) का उल्लंघन है। जस्टिस नागरत्ना ने इस संदर्भ में सवाल उठाया कि धार्मिक परंपराओं के नाम पर इस तरह के भेदभाव को कैसे जायज ठहराया जा सकता है।
  • पितृसत्तात्मक मानसिकता पर प्रहार: पूर्व के फैसलों में यह माना गया था कि मासिक धर्म की स्थिति के आधार पर रोक लगाना महिलाओं को अधीनस्थ स्थिति में रखता है, जो उनकी गरिमा के विरुद्ध है।

केंद्र सरकार का रुख और तर्क

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर का मामला केवल एक विशिष्ट आयु वर्ग (10 से 50 वर्ष) से संबंधित है और इसे व्यापक लैंगिक भेदभाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके तर्कों के मुख्य अंश इस प्रकार हैं:

  1. आयु आधारित प्रतिबंध: सरकार के अनुसार, यह रोक मासिक धर्म पर आधारित न होकर केवल एक निश्चित आयु वर्ग के लिए है।
  2. विशिष्ट परंपरा: यह दावा किया गया कि भगवान अय्यप्पा के अन्य सभी मंदिर महिलाओं के लिए खुले हैं, केवल इस विशेष मंदिर की परंपरा अनूठी है।
  3. वैश्विक धारणा: तुषार मेहता ने कहा कि भारत उतना पितृसत्तात्मक नहीं है जितना पश्चिमी देश इसे समझते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि और भविष्य की दिशा

सबरीमाला विवाद की कानूनी यात्रा काफी लंबी रही है। सितंबर 2018 में 5 जजों की बेंच ने महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था। हालांकि, बाद में इस मुद्दे को व्यापक संवैधानिक सवालों के साथ 9 जजों की बड़ी बेंच को भेज दिया गया। वर्तमान में यह बेंच न केवल सबरीमाला, बल्कि विभिन्न धर्मों में महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक रीति-रिवाजों के बीच के संतुलन की व्याख्या कर रही है।

एक झलक

  • जस्टिस नागरत्ना की राय: महिलाओं को कुछ दिनों के लिए अछूत मानना अनुचित है।
  • सुनवाई का मंच: 9 जजों की संविधान पीठ मामले की समीक्षा कर रही है।
  • केंद्र का तर्क: प्रतिबंध केवल विशिष्ट आयु वर्ग के लिए है, मासिक धर्म के कारण नहीं।
  • विवाद की जड़: अनुच्छेद 17 और धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) के बीच का कानूनी टकराव।
  • अगला कदम: बड़ी बेंच धार्मिक प्रथाओं की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय लेगी।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *