“कर्ज में डूबे राज्य, फिर भी बांटी जा रही रेवड़ियां!” बिजली मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को देश के विभिन्न राज्यों में चल रही ‘मुफ्तखोरी या रेवड़ी संस्कृति’ (Freebie Culture) पर गहरी चिंता व्यक्त की है। तमिलनाडु बिजली वितरण निगम की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली की पीठ ने कहा कि यह संस्कृति राज्यों के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो रही है। अदालत ने कहा कि राजनीतिक दल जन कल्याण के नाम पर खैरात बांटकर सत्ता हासिल करने की होड़ में लगे हैं, जिससे सरकारी खजाने पर भारी दबाव पड़ रहा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, “राज्य कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं, लेकिन फिर भी मुफ्त उपहार बांटे जा रहे हैं। क्या राजस्व का २५ प्रतिशत हिस्सा राज्यों के विकास के लिए इस्तेमाल नहीं होना चाहिए?” कोर्ट ने सुझाव दिया कि मुफ्त चीजें बांटने के बजाय सरकारों को बेरोजगारी दूर करने और जीवन स्तर सुधारने के लिए ठोस नीतियां बनानी चाहिए। अदालत ने तमिलनाडु सरकार से यह भी पूछा कि क्या बिल चुकाने में सक्षम लोगों को भी मुफ्त बिजली देना केवल तुष्टीकरण की नीति नहीं है?
इस टिप्पणी का असर अब पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी महसूस किया जा रहा है, जहां कई नकद लाभ योजनाएं (जैसे लक्ष्मी भंडार) संचालित हैं। विपक्षी दल बीजेपी ने अब ममता सरकार की इन योजनाओं के कारण बढ़ते राजकोषीय घाटे पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह समस्या किसी एक राज्य की नहीं बल्कि पूरे देश की है और अब समय आ गया है कि ‘पॉलिटिकल करेंसी’ के रूप में इस्तेमाल हो रही इन खैरातों पर लगाम लगाई जाए।