ब्राह्मण वोट बैंक पर BJP का संकट! कोर वोटर ने छोड़ा साथ? प्रशांत किशोर की ‘जनसुराज’ में बढ़ रहा अगड़ी जाति का रुझान
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए उसके पारंपरिक ब्राह्मण वोटर्स एक बड़ी चिंता का वजह बन गए हैं। पिछले 20-25 सालों से बीजेपी का कोर वोट बैंक मानी जाने वाली अगड़ी जाति अब धीरे-धीरे पार्टी से दूर होती दिख रही है।
पार्टी के आंतरिक सर्वे में भी इस बदलाव की पुष्टि हुई है। बीजेपी नेतृत्व उन्हें अब तक ‘मजबूर वोटर’ मानकर चल रहा था, जो कांग्रेस से मोहभंग के बाद बीजेपी के साथ जुड़े थे। मगर, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कथित उपेक्षा के कारण अब इस समाज में असंतोष साफ दिख रहा है।
ब्राह्मण समाज की नाराजगी की वजह:
ब्राह्मण समाज का आरोप है कि उनका एकमुश्त वोट बीजेपी को मिलता है, लेकिन उन्हें उचित राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं दी जाती है।
- टिकट वितरण में भेदभाव: 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने ब्राह्मण समाज को केवल 11 टिकट दिए, जबकि भूमिहारों को 15, राजपूतों को 21 और कायस्थों को 3 टिकट दिए गए। यह असंतुलित प्रतिनिधित्व नाराजगी का मुख्य कारण बना।
- मंत्रिमंडल में न्यूनतम भागीदारी: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में बीजेपी कोटे से सिर्फ दो ब्राह्मण मंत्री (मंगल पांडेय और नीतीश मिश्रा) हैं। हाल ही के लोकसभा चुनाव में भी इस समाज को सिर्फ 2 टिकट दिए गए थे, जिनमें से 1 ही जीत सका।
बिहार में ब्राह्मणों की आबादी:
साल 2023 के जाति आधारित सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार की कुल आबादी में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी 3.66% है, जो सवर्ण जातियों (कुल 15.22%) में सबसे अधिक है। इसके बाद राजपूत (3.45%) और भूमिहार (2.86%) आते हैं। इतनी बड़ी आबादी का छिटकना बीजेपी की चुनावी रणनीति को सीधे प्रभावित कर सकता है।
जनसुराज की ओर ब्राह्मणों का झुकाव:
बीजेपी के आंतरिक सर्वेक्षण ने भी इस बात को उजागर किया है कि ब्राह्मण समाज का सबसे अधिक मोहभंग बीजेपी से हुआ है। अब इस वर्ग का एक बड़ा हिस्सा प्रशांत किशोर की नई पार्टी जनसुराज में अपना राजनीतिक भविष्य देख रहा है। अगड़ी जाति के इस बढ़ते रुझान ने बीजेपी के लिए आगामी चुनाव में बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।