फारस बनाम अरब: ईरान की ‘तन्हाई’ के पीछे का कड़वा सच, आखिर क्यों मुस्लिम वर्ल्ड में बंटा हुआ है नेतृत्व?

मध्य पूर्व की राजनीति में एक सवाल हमेशा गूंजता है—जब इजरायल और अमेरिका ईरान पर हमला करते हैं, तो बाकी मुस्लिम देश खामोश क्यों रहते हैं? ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया बहुसंख्यक देश है, जबकि सऊदी अरब, जॉर्डन और मिस्र जैसे देश सुन्नी बहुसंख्यक हैं। नेतृत्व को लेकर साल 632 ईस्वी से चला आ रहा यह शिया-सुन्नी विवाद आज भी राजनीतिक दूरियों का सबसे बड़ा कारण है।

ईरान खुद को शिया समुदाय का रक्षक मानता है और इराक, लेबनान व यमन में सक्रिय शिया गुटों का समर्थन करता है। इसे सऊदी अरब जैसे देश अपने नेतृत्व के लिए खतरे के रूप में देखते हैं। इसके अलावा, ईरान ‘अरब’ नहीं बल्कि ‘पारसी’ (Persian) सभ्यता का उत्तराधिकारी है, जिससे सांस्कृतिक दूरियां भी बढ़ती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश अरब देशों के अमेरिका के साथ मजबूत आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं। वे वॉशिंगटन को नाराज करके ईरान का साथ देने का जोखिम नहीं उठाना चाहते। यही कारण है कि संघर्ष की घड़ी में ईरान अक्सर खुद को अकेला पाता है।

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