महाराजा महताब चंद की परंपरा आज भी कायम! बर्धमान में 300 साल पुराने इतिहास के कारण देरी से होती है होली

जब पूरा देश होली के हुड़दंग और रंगों में डूबा होता है, तब पश्चिम बंगाल के बर्धमान शहर में सन्नाटा रहता है। यहाँ के लोग कैलेंडर की तारीख के एक दिन बाद रंगों का त्योहार यानी ‘दोल उत्सव’ मनाते हैं। इस अनोखी परंपरा के पीछे बर्धमान राजघराने का 300 साल पुराना गौरवशाली इतिहास छिपा है।

क्या है इतिहास? इतिहासकारों के अनुसार, 1830 के दशक में बर्धमान के महाराजा महताब चंद के समय से यह प्रथा चली आ रही है। राजबाड़ी के कुलदेवता लक्ष्मीनारायण जीयू का मंदिर बड़ाबाजार इलाके में स्थित है। परंपरा यह थी कि दोल (होली) के पहले दिन केवल देवताओं को अबीर अर्पित किया जाता था। राजबाड़ी में दिनभर धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते थे। चूंकि उस दिन को देवताओं के लिए समर्पित माना जाता था, इसलिए कोई भी व्यक्ति एक-दूसरे को रंग नहीं लगाता था।

आज भी जारी है परंपरा: भले ही आज राजशाही खत्म हो गई है, लेकिन बर्धमान के निवासियों ने महाराजाओं के प्रति सम्मान दिखाने के लिए इस नियम को आज भी जीवित रखा है। जब पूरा देश होली मना चुका होता है, तब अगले दिन बर्धमान की सड़कों पर रंगों का सैलाब उमड़ता है। स्टेशन बाजार, बीसी रोड और टाउनहॉल मैदान जैसे इलाकों में अबीर, रंगीन पिचकारियों और मुखौटों की भारी बिक्री होती है। यह परंपरा बर्धमान की सांस्कृतिक पहचान का एक अटूट हिस्सा बन चुकी है।

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