स्वामी विवेकानंद का वो एक मंत्र, जो सोई हुई किस्मत को जगा दे! आज के युवाओं के लिए है वरदान

स्वामी विवेकानंद केवल एक सन्यासी नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक भारत के पुनर्जागरण के अग्रदूत थे। 19वीं सदी के अंत में जब भारत गुलामी और हीनभावना की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब विवेकानंद ने कठोपनिषद के एक श्लोक को आधुनिक संदर्भ में ढालकर देश को नया मंत्र दिया— ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए’ (उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत)।
जागने का वास्तविक अर्थ: विवेकानंद की दृष्टि में ‘जागने’ का मतलब केवल नींद से उठना नहीं था, बल्कि यह मानसिक और आत्मिक चेतना का आह्वान था। उनका मानना था कि मनुष्य के भीतर अनंत शक्ति और संभावनाएं सुप्त अवस्था में हैं। माया और अज्ञानता के कारण इंसान खुद को कमजोर समझने लगता है। उन्होंने स्पष्ट कहा था, “जैसा तुम सोचोगे, वैसे ही बन जाओगे। यदि खुद को कमजोर मानोगे तो कमजोर बनोगे, और यदि खुद को शक्तिशाली मानोगे तो शक्तिशाली बन जाओगे।”
क्यों पड़ी इस आह्वान की जरूरत? शिकागो धर्म महासभा में विश्व विजय के बाद जब विवेकानंद भारत लौटे, तो उन्होंने देखा कि यहाँ के युवा भाग्यवादी और आलसी हो गए हैं। वे हर असफलता के लिए किस्मत को दोष दे रहे थे। कोलंबो से अल्मोड़ा तक दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषणों में उन्होंने युवाओं के भीतर आत्मविश्वास भरने के लिए इस मंत्र का प्रयोग किया। वे ऐसे युवाओं की फौज खड़ी करना चाहते थे जिनकी ‘मांसपेशियां लोहे की और नसें फौलाद की’ हों।
लक्ष्य के प्रति अटूट निष्ठा: आज के प्रतिस्पर्धी युग में विवेकानंद की यह सीख और भी प्रासंगिक हो गई है कि जब तक मंजिल न मिले, रुकना मना है। उन्होंने सिखाया कि किसी एक विचार को अपना जीवन बना लो— उसी के बारे में सोचो और उसी के लिए जियो। हार तब नहीं होती जब आप गिर जाते हैं, बल्कि हार तब होती है जब आप दोबारा उठने से इनकार कर देते हैं। 2026 के इस डिजिटल युग में, जब युवा मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं, स्वामी जी का यह जीवंत दर्शन उन्हें अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने का सामर्थ्य रखता है।