ईरान-अमेरिका के बीच ‘शांतिदूत’ बना पाकिस्तान! शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर की मध्यस्थता ने चौंकाया

मध्य एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच अचानक हुए युद्धविराम ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। इस चमत्कार के पीछे पाकिस्तान की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री ने एक पोस्ट के जरिए पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की जमकर तारीफ की है। उन्होंने दोनों को “प्रिय भाई” बताते हुए इस शांति प्रक्रिया का श्रेय दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा इस संदेश को साझा किए जाने के बाद अब इस्लामाबाद की वैश्विक साख बढ़ती दिख रही है।
इस्लामाबाद में होगी महा-शांति वार्ता: पाकिस्तानी पीएम ने घोषणा की है कि अमेरिका और ईरान लेबनान सहित सभी मोर्चों पर दो सप्ताह के युद्धविराम के लिए तैयार हैं। शरीफ ने 10 अप्रैल को दोनों देशों के प्रतिनिधियों को इस्लामाबाद आमंत्रित किया है, ताकि एक स्थायी शांति समझौते पर मुहर लग सके। हालांकि, इस बीच शरीफ एक सोशल मीडिया पोस्ट के कारण ट्रोल भी हुए। दरअसल, व्हाइट हाउस के मैसेज को कॉपी करते समय उन्होंने गलती से ‘ड्राफ्ट’ शब्द भी पोस्ट कर दिया, जिसे बाद में सुधारा गया।
पाकिस्तान पर ही क्यों जताया भरोसा? विशेषज्ञों के अनुसार, इसके तीन मुख्य कारण हैं: १. ईरान का विश्वास: इजरायल के साथ पाकिस्तान के कोई संबंध न होना तेहरान के लिए उसे एक निष्पक्ष साथी बनाता है। २. ट्रम्प का साथ: अमेरिका के साथ हालिया सुधरते रिश्तों ने वॉशिंगटन को इस्लामाबाद पर भरोसा करने का मौका दिया। ३. आर्थिक मजबूरी: पाकिस्तान की खुद की अर्थव्यवस्था तेल आयात और रेमिटेंस पर टिकी है। युद्ध जारी रहने से हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का खतरा था, जो पाकिस्तान को बर्बादी की ओर ले जाता।
कामयाबी के साथ जुड़ा बड़ा जोखिम: भले ही पाकिस्तान ने इस समय वाहवाही लूट ली हो, लेकिन यह शांति बहुत नाजुक है। यदि 10 अप्रैल की वार्ता विफल होती है, तो इसका ठीकरा पाकिस्तान पर फूट सकता है। अमेरिका की ओर झुकने पर घरेलू विद्रोह और ईरान का साथ देने पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का खतरा पाकिस्तान के लिए ‘दोधारी तलवार’ जैसा है। फिलहाल, दुनिया की नजरें इस्लामाबाद में होने वाली 10 अप्रैल की बैठक पर टिकी हैं।