लोकतंत्र का मज़ाक! जिस अधिकारी ने चुनाव कराए, उसी का नाम वोटर लिस्ट से गायब!

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एक समय में जो अधिकारी यह तय करते थे कि किसे वोट देने का अधिकार है और किसे नहीं, आज उनका अपना ही नाम मतदाता सूची से गायब कर दिया गया है। राज्य चुनाव आयोग के पूर्व सचिव और राष्ट्रीय चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त पूर्व चुनाव पर्यवेक्षक (WBCS) उस्मान गनी का नाम सप्लीमेंट्री लिस्ट से हटा दिया गया है।
पारिवारिक सूची में अजीब विसंगति: पार्क सर्कस के निवासी उस्मान गनी १६१ बालीगंज विधानसभा क्षेत्र के मतदाता थे। हैरानी की बात यह है कि उनकी पत्नी और बेटी का नाम सूची में सुरक्षित है, लेकिन केवल उस्मान गनी के नाम को ‘लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी’ (तार्किक विसंगति) की श्रेणी में डालकर बाहर कर दिया गया है। गनी के अनुसार, २००२ और २०२५ की सूची में उनका नाम था और उनके पिता-माता के दस्तावेजों में भी कोई तकनीकी त्रुटि नहीं थी।
प्रक्रिया पर उठे सवाल: उस्मान गनी का आरोप है कि इस विशेष संशोधन (SIR) के दौरान उन्हें न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई के लिए बुलाया गया। बिना किसी संपर्क या दस्तावेज मांगे उनका नाम काट दिया गया। जब उन्होंने जिला चुनाव अधिकारी (दक्षिण) से संपर्क किया, तो वहां से भी कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। पूर्व अधिकारी ने आक्रोश जताते हुए कहा, “मैं जन्म से भारतीय नागरिक हूँ। एक पूर्व उच्च पदस्थ अधिकारी होने के बावजूद मेरा लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिया गया। क्या देश में प्राकृतिक न्याय का कोई महत्व नहीं बचा?”
ट्रिब्यूनल जाने की तैयारी: गौरतलब है कि २०१४ के लोकसभा चुनाव में उस्मान गनी ने राजस्थान में चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं। वर्तमान में लगभग ५० लाख नामों के निपटान के दौरान ४५ प्रतिशत नामों को सूची से हटाया गया है, जिसमें ऐसी गड़बड़ी कई सवाल खड़े करती है। उस्मान गनी अब अपने पासपोर्ट, नियुक्ति पत्र और पेंशन भुगतान आदेश (PPO) जैसे दस्तावेजों के साथ अपीलीय ट्रिब्यूनल जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग को पत्र भी लिखा है, जिसका जवाब अभी तक नहीं मिला है।