रेजिनागर में हुमायूँ का ‘बाबरी’ कार्ड! घर का बेटा या धार्मिक मुद्दा— किस करवट बैठेगा मुर्शिदाबाद का ऊंट?

मुर्शिदाबाद जिले की राजनीति में हुमायूँ कबीर एक ऐसा नाम है जो अपनी शर्तों पर राजनीति करने के लिए जाना जाता है। २०२६ के विधानसभा चुनाव से पहले रेजिनागर की सड़कों पर एक ही सवाल गूँज रहा है— हुमायूँ कबीर का असली हथियार क्या है? क्या वह अपने ‘लोकल बॉय’ (घरों छैले) की छवि पर भरोसा कर रहे हैं, या फिर बेलडांगा में बन रही ‘बाबरी मस्जिद’ के जरिए धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं? ईटीवी भारत की रिपोर्ट के अनुसार, कबीर इस बार रेजिनागर के साथ-साथ नौदा सीट से भी चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं, जिससे उनकी जीत की संभावनाओं पर सवाल उठने लगे हैं।

विवादों से भरा राजनीतिक सफर: हुमायूँ कबीर का करियर कांग्रेस से शुरू हुआ, जहाँ २०११ में उन्होंने पहली बार जीत दर्ज की। लेकिन जल्द ही वह पाला बदलकर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और मंत्री बने। हालांकि, २०१३ के उपचुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। बार-बार दल बदलने और विवादित बयानों के कारण उन्हें तृणमूल से दो बार निलंबित किया गया। २०२१ में उन्होंने भरतपुर से जीत हासिल की, लेकिन हाल ही में फिर से पार्टी से बाहर किए जाने के बाद उन्होंने ‘जनता विकास पार्टी’ (JUP) के नाम से अपना नया संगठन खड़ा कर लिया है।

बाबरी मस्जिद निर्माण और चुनावी दांव: दिसंबर २०२५ में हुमायूँ ने बेलडांगा में बाबरी मस्जिद की आधारशिला रखकर सबको चौंका दिया था। अब निर्माणाधीन मस्जिद उनके चुनाव प्रचार का केंद्र बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वह अल्पसंख्यकों के वोट बैंक को साधने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल कर रहे हैं। रेजिनागर की जनता अब इस कशमकश में है कि वे विकास को वोट दें या हुमायूँ के इस ‘इमोशनल कार्ड’ को। क्या हुमायूँ कबीर २०२६ में ‘किंगमेकर’ बनेंगे या अपनी ही बिछाई बिसात में उलझ जाएंगे, यह तो वक्त ही बताएगा।

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